लाग़र[1] इतना हूं कि, गर तू बज़्म[2] में जा दे मुझे
मेरा ज़िम्मा, देख कर गर कोई बतला दे मुझे

क्या तअ़ज्जुब है कि उस को, देख कर आ जाए रहम
वां तलक कोई किसी हीले से पहुंचा दे मुझे

मुंह न दिखलावे न दिखला, पर ब अंदाज़-ए`इताब[3]
खोल कर परदा ज़रा, आँखें ही दिखला दे मुझे

यां तलक मेरी गिरफ़्तारी से वह ख़ुश है, कि मैं
ज़ुल्फ़ गर बन जाऊं, तो शाने[4] में उलझा दे मुझे

शब्दार्थ:
  1. दुर्बल
  2. महफिल
  3. गुस्से के ढंग से
  4. कंघी
Please join our telegram group for more such stories and updates.telegram channel

Books related to दीवान ए ग़ालिब


मिर्ज़ा ग़ालिब की रचनाएँ
दीवान ए ग़ालिब