गुलशन को तेरी सोहबत अज़ बसकि ख़ुश[1] आई है
हर ग़ुंचे का गुल होना आग़ोश-कुशाई[2] है

वां कुनगुर-ए-इसतिग़ना[3] हर दम है बुलंदी पर
यां नाले को और उलटा दावा-ए-रसाई[4] है

अज़ बसकि सिखाता है ग़म, ज़ब्त के अन्दाज़े
जो दाग़ नज़र आया इक चश्म-नुमाई[5] है

शब्दार्थ:
  1. पसंद
  2. आलिंगन खुलना
  3. बेपरवाही का मुकुट
  4. ढिठाई
  5. फटकार
Please join our telegram group for more such stories and updates.telegram channel

Books related to दीवान ए ग़ालिब


मिर्ज़ा ग़ालिब की रचनाएँ
दीवान ए ग़ालिब